जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ सावरकर मामले में भी राहुल को फटकार लगा चुकी है!

सुप्रीम कोर्ट ने चार महीने में दूसरी बार कांग्रेस नेता राहुल गांधी को फटकार लगाई है। संयोगवश, दोनों बार सुप्रीम कोर्ट की जिन पीठों ने सुनवाई की, उनकी अध्यक्षता जस्टिस दीपांकर दत्ता कर रहे थे। आज का मामला राहुल गांधी के 2022 में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान दिए गए बयानों से संबंधित था। यात्रा के दौरान, राहुल गांधी ने दावा किया था कि चीन ने भारत की 2000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर लिया है और अरुणाचल प्रदेश में चीनी सैनिक भारतीय सैनिकों को “पीट रहे हैं।” इसके अलावा, उन्होंने 2020 के गलवान घाटी संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा था कि 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे और सरकार ने इस मामले में “जमीन को आत्मसमर्पण” कर दिया। इससे पहले का मामला वी. डी. सावरकर के खिलाफ विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा की गई टिप्पणियों से संबंधित था।

आज की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जॉर्ज मसीह की पीठ के समक्ष हुई, जिसमें पीठ ने भारतीय सेना पर आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी को फटकार लगाई। कोर्ट ने पूछा, “आपको कैसे पता चला कि चीन ने भारत की 2000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर लिया है? विश्वसनीय जानकारी क्या है? अगर आप सच्चे भारतीय होते, तो ऐसा नहीं कहते। जब सीमा पर संघर्ष चल रहा हो, तो क्या आप ये सब कह सकते हैं? आप संसद में सवाल क्यों नहीं पूछ सकते? आप (राहुल गांधी) विपक्ष के नेता हैं, संसद में बोलें, सोशल मीडिया पर नहीं।” इसके साथ, सेना पर आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में लखनऊ की कोर्ट में राहुल के खिलाफ चल रही कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी।

इससे पहले, 25 अप्रैल 2025 को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने वी. डी. सावरकर के खिलाफ राहुल गांधी द्वारा की गई टिप्पणियों पर मौखिक रूप से असहमति जताई। मामले की सुनवाई शुरू होते ही जस्टिस दत्ता ने राहुल गांधी के इस बयान पर आपत्ति जताई कि सावरकर अंग्रेजों के सेवक थे। जस्टिस दत्ता ने पूछा, “क्या महात्मा गांधी को अंग्रेजों का सेवक सिर्फ इसलिए कहा जा सकता है, क्योंकि उन्होंने वायसराय को लिखे अपने पत्रों में ‘आपका वफादार सेवक’ शब्द का इस्तेमाल किया था?”

जस्टिस दत्ता ने राहुल गांधी का प्रतिनिधित्व कर रहे सीनियर एडवोकेट ए. एम. सिंघवी से पूछा, “क्या आपके मुवक्किल को पता है कि महात्मा गांधी ने भी वायसराय को संबोधित करते समय ‘आपका वफादार सेवक’ शब्द का इस्तेमाल किया था? क्या आपके मुवक्किल को पता है कि उनकी दादी (इंदिरा गांधी) जब प्रधानमंत्री थीं, तब उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी सावरकर की प्रशंसा करते हुए एक पत्र भेजा था?”

जस्टिस दत्ता ने टिप्पणी की, “उन्हें स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में गैर-जिम्मेदाराना बयान नहीं देना चाहिए। आपने कानून का एक अच्छा बिंदु रखा है। आप इस पर रोक लगाने के हकदार हैं। हम यह जानते हैं। लेकिन आप हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करते। जब आपको भारत के इतिहास या भूगोल के बारे में कुछ भी पता नहीं है।”

जस्टिस दत्ता ने कहा, “वह एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। वह राजनीतिक दल के नेता हैं। आपको इस तरह से परेशानी क्यों खड़ी करनी चाहिए? आप अकोला जाते हैं और यह बयान देते हैं, महाराष्ट्र में, जहां सावरकर की पूजा की जाती है? ऐसा मत करो। आप यह बयान क्यों देते हैं?” उन्होंने कहा कि कलकत्ता हाईकोर्ट के जज भी ब्रिटिश काल में चीफ जस्टिस को “आपका सेवक” कहकर संबोधित करते थे। जस्टिस दत्ता ने कहा, “कोई इस तरह सेवक नहीं बनता। अगली बार कोई कहेगा कि महात्मा गांधी अंग्रेजों के सेवक थे। आप इस तरह के बयानों को बढ़ावा दे रहे हैं।”

पीठ ने कहा कि वह कार्यवाही पर रोक लगाने के लिए इच्छुक है, लेकिन इस शर्त पर कि वह भविष्य में इस तरह का कोई बयान नहीं देंगे। जस्टिस दत्ता ने कहा, “हम आपको रोक देंगे…लेकिन हम आपको गैर-जिम्मेदाराना बयान देने से रोकेंगे। स्पष्ट कर दें, कोई और बयान देने पर हम स्वत: संज्ञान लेंगे और मंजूरी का कोई सवाल ही नहीं है! हम आपको हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में कुछ भी बोलने की अनुमति नहीं देंगे। उन्होंने हमें स्वतंत्रता दी है और हम उनके साथ ऐसा व्यवहार करते हैं?”

सिंघवी ने मौखिक रूप से वचन दिया कि इस तरह का कोई बयान नहीं दिया जाएगा। न्यायालय ने आदेश में इस शर्त को निर्दिष्ट नहीं किया, लेकिन लखनऊ कोर्ट में राहुल गांधी के खिलाफ लंबित आपराधिक मानहानि की कार्यवाही पर रोक लगा दी और मौखिक रूप से चेतावनी दी कि अगर उन्होंने भविष्य में ऐसी कोई टिप्पणी की, तो उनके खिलाफ स्वत: संज्ञान से कार्रवाई की जाएगी।

स्वयं तत्कालीन चीफ जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा था कि जब तक फैसले में अदालत का अंतिम शब्द नहीं छपता, अदालत ने जो कुछ भी कहा है, वह उस पल के लिए सिर्फ एक टिप्पणी है। इसका कोई पूर्ववर्ती मूल्य नहीं है। इसका उपयोग भविष्य की किसी भी कार्यवाही में नहीं किया जा सकता। यानी इसका कोई न्यायिक मूल्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण का भी कहना है कि “एक मौखिक टिप्पणी कानून नहीं बन सकती।”

2021 में, मद्रास हाईकोर्ट द्वारा भारत के चुनाव आयोग के खिलाफ की गई कुछ टिप्पणियों के संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों को बिना सोचे-समझे टिप्पणी करते समय सावधानी बरतने की सलाह दी थी। “हमें न्यायाधीशों द्वारा खुली अदालत में बिना सोचे-समझे की गई टिप्पणियों में सावधानी बरतने की आवश्यकता पर बल देना चाहिए, क्योंकि उनकी गलत व्याख्या की जा सकती है। बेंच और निर्णयों में भाषा न्यायिक मर्यादा के अनुरूप होनी चाहिए।” हाल ही में, कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा किशोरों पर की गई कुछ टिप्पणियों को अस्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “न्यायाधीश को मामले का फैसला करना होता है, उपदेश नहीं देना होता।”

सुप्रीम कोर्ट में युवा वकील मनोज अभिज्ञान ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है कि न्यायिक दार्शनिक रोनाल्ड ड्वर्किन ने न्याय की व्याख्या करते हुए कहा था, “न्याय बहुमत की राय का मामला नहीं है, बल्कि सभी के लिए सुरक्षित अधिकारों का है, भले ही वे अलोकप्रिय हों।” किसी नेता के विचार अलोकप्रिय हों, फिर भी उन्हें बोलने का अधिकार है। यही सच्चा लोकतंत्र है। ‘सच्चा भारतीय कौन है’ यह न्यायालय का विषय नहीं है। न्यायालय का विषय है-क्या कोई अपराध सिद्ध होता है, और क्या व्यक्ति का मौलिक अधिकार सुरक्षित है।

राहुल गांधी को अंतरिम राहत मिलना एक कानूनी संतुलन की दिशा में कदम हो सकता है, लेकिन मौखिक टिप्पणियों में यदि पूर्वग्रह झलकने लगे, तो यह न्याय प्रक्रिया की नैतिक अखंडता पर चोट करता है। भारतीय न्यायपालिका को अपने निर्णयों और टिप्पणियों में न्यायिक गरिमा और संवैधानिक मूल्यों को सर्वोच्च रखना होगा, अन्यथा वह स्वयं राजनीतिक विमर्श में एक पक्ष बनती नजर आएगी, जो किसी भी लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद कांग्रेस ने कहा कि चीन पर जवाब मांगना हर देशभक्त भारतीय का अधिकार है। क्या विपक्ष को सवाल पूछने की सजा दी जा रही है? सुप्रीम कोर्ट द्वारा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को उनके चीन से जुड़े बयानों पर फटकार लगाए जाने के बाद कांग्रेस ने मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है।

कांग्रेस ने कहा कि 2020 के गलवान संघर्ष के बाद से ‘हर देशभक्त भारतीय’ ने चीन के अतिक्रमण और सीमा पर तनाव को लेकर जवाब मांगा है, लेकिन मोदी सरकार ने अपनी ‘डिनायल, डिस्ट्रैक्ट, लाई, जस्टिफाई’ (DDLJ) नीति के तहत सच्चाई को छिपाने और भटकाने का काम किया है। पार्टी ने केंद्र पर आरोप लगाया कि उसने 1962 के बाद भारत को सबसे बड़े क्षेत्रीय नुकसान का सामना करने के लिए मजबूर किया और आर्थिक हितों व कायरता के कारण चीन के साथ सामान्यीकरण की नीति अपनाई।

कांग्रेस के आठ तीखे सवाल

1. 19 जून 2020 को गलवान में हमारे सैनिकों की शहादत के महज चार दिन बाद प्रधानमंत्री ने यह क्यों कहा कि “ना कोई हमारी सीमा में घुस आया है, ना ही कोई घुसा हुआ है”? क्या यह चीन को दी गई क्लीन चिट नहीं थी?

2. सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा है कि “हम अप्रैल 2020 की यथास्थिति पर लौटना चाहते हैं।” क्या 21 अक्टूबर 2024 को हुआ वापसी समझौता हमें वास्तव में उसी यथास्थिति पर ले जाता है?

3. क्या यह सच नहीं है कि आज भारतीय गश्ती दलों को डेपसांग, डेमचोक और चुमार में अपने ही पेट्रोलिंग प्वाइंट तक जाने के लिए अब चीनी सहमति की जरूरत पड़ती है, जबकि पहले वे भारत के क्षेत्रीय अधिकारों का स्वतंत्र रूप से उपयोग करते थे?

4. क्या यह सही नहीं है कि गलवान, हॉट स्प्रिंग और पैंगोंग झील क्षेत्र में भारतीय गश्ती दलों को उन इलाकों तक पहुंचने से ‘बफर जोन’ के कारण रोका जा रहा है, जबकि ये बफर जोन भारत के दावे की रेखा के भीतर ही स्थित हैं?

5. क्या 2020 में यह व्यापक रूप से रिपोर्ट नहीं किया गया था कि पूर्वी लद्दाख का लगभग 1000 वर्ग किलोमीटर इलाका चीनी नियंत्रण में आ गया है, जिसमें डेपसांग का 900 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र भी शामिल है?

6. क्या यह सच नहीं है कि लेह के पुलिस अधीक्षक ने पुलिस महानिदेशकों के वार्षिक सम्मेलन में एक पेपर पेश किया था, जिसमें कहा गया था कि भारत ने पूर्वी लद्दाख में 65 में से 26 पेट्रोलिंग प्वाइंट तक अपनी पहुंच खो दी है?

7. क्या यह सच नहीं है कि चीन से आयात तेजी से बढ़ रहा है-विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी और सौर सेल जैसे क्षेत्रों में? भारत का टेलीकॉम, फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर चीनी आयात पर अत्यधिक निर्भर हो गया है? क्या यह भी सही नहीं है कि 2024-25 में चीन के साथ व्यापार घाटा रिकॉर्ड 99.2 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया?

8. क्या यह सच नहीं है कि मोदी सरकार आज एक ऐसे देश के साथ ‘रिश्ते सामान्य करने’ की कोशिश कर रही है, जिसने ऑपरेशन सिन्धु के दौरान पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई में अहम भूमिका निभाई थी, पाकिस्तान को J-10C लड़ाकू विमान और हवा से हवा में मार करने वाली PL-15 मिसाइल जैसी हथियार प्रणालियां प्रदान की थीं और, जैसा कि 4 जुलाई 2025 को उप-सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर. सिंह ने कहा था, भारतीय सैन्य अभियानों पर ‘लाइव इनपुट’ भी उपलब्ध कराया?

    (जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं)

    Leave a Reply